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सम्पूर्ण चाणक्य नीति (Complete Chanakya Niti In Hindi)

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Complete Chanakya Neeti In Hindi (सम्पूर्ण चाणक्य नीति)  Chanakya Neeti in Hindi - First Chapter (चाणक्य नीति - प्रथम अध्याय) Chanakya Neeti in Hindi - Second Chapter (चाणक्य नीति - दूसरा अध्याय) Chanakya Neeti in Hindi - Third Chapter (चाणक्य नीति - तीसरा अध्याय) Chanakya Neeti In Hindi - Fourth Chapter (चाणक्य नीति - चौथा अध्याय) Chanakya Neeti In Hindi - Fifth Chapter (चाणक्य नीति - पांचवा अध्याय) Chanakya Neeti In Hindi - Sixth Chapter (चाणक्य नीति - छठवां अध्याय) Chanakya Niti In Hindi - Seventh Chapter (चाणक्य नीति - सातवां अध्याय) Chanakya Niti In Hindi - Eighth Chapter (चाणक्य नीति - आंठवा अध्याय) Chanakya Niti in Hindi Ninth Chapter (चाणक्य नीति - नववा अध्याय) Chanakya Niti in Hindi Tenth Chapter (चाणक्य नीति - दसवा अध्याय) Chanakya Niti in Hindi - Eleventh Chapter (चाणक्य नीति - ग्यारहवा अध्याय) Chanakya Neeti - Twelfth Chapter in Hindi (चाणक्य नीति - बारहवा अध्याय) Chanakya Neeti - Thirteenth Chapter in Hindi (चाणक्य नीति - तेरहवा अध्याय) ...

Chanakya Niti - Seventeenth Chapter in Hindi (चाणक्य नीति - सत्रहवां अध्याय)

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Chanakya Neeti - Seventeenth Chapter  (चाणक्य नीति -  सत्रहवां अध्याय) 1: जिस प्रकार पर-पुरुष से गर्भ धारण करने वाली स्त्री शोभा नहीं पति, उसी प्रकार गुरु के चरणो में बैठकर विद्या प्राप्त न करके इधर-उधर से पुस्तके पढ़कर जो ज्ञान प्राप्त करते है, वे विद्वानों की सभा में शोभा नहीं पाते क्योंकि उनका ज्ञान अधूरा होता है। उसमे परिपक्वता नहीं होती। अधूरे ज्ञान के कारण वे शीघ्र ही उपहास के पात्र बन जाते है। 2: उपकार का बदला उपकार से देना चाहिए और हिंसा वाले के साथ हिंसा करनी चाहिए। वहां दोष नहीं लगता क्योंकि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना ही ठीक रहता है। 3: तप में असीम शक्ति है। तप के द्वारा सभी कुछ प्राप्त किया जा सकता है। जो दूर है, बहुत अधिक दूर है, जो बहुत कठिनता से प्राप्त होने वाला है और बहुत दूरी पर स्थित है, ऐसे साध्य को तपस्या के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। अतः जीवन में साधना का विशेष महत्व है। इसके द्वारा ही मनोवांछित सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। 4: लोभ सबसे बड़ा अवगुण है, पर निंदा सबसे बड़ा पाप है, सत्य सबसे बड़ा तप है और मन की पवित्रता सभी तीर्थो में जा...

Chanakya Niti - Sixteenth Chapter in Hindi (चाणक्य नीति - सोलहवां अध्याय)

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Chanakya Neeti - Sixteenth Chapter  (चाणक्य नीति -  सोलहवां अध्याय) 1: संसार के उद्धार के लिए जिन लोगो ने विधिपूर्वक परमेश्वर का ध्यान नहीं किया, स्वर्ग में समर्थ धर्म का उपार्जन नहीं किया, स्वप्न में भी सुन्दर युवती के कठोर स्तनों और जंघाओं के आलिंगन का भोग नहीं किया, ऐसे व्यक्ति का जन्म माता के यौवन रूपी वन को काटने वाली कुल्हाड़ी के समान है। 2: आचार्य चाणक्य का मानना है कि कुलटा (चरित्रहीन) स्त्रियों का प्रेम एकान्तिक न होकर बहुजनीय होता है। उनका कहना है की कुलटा स्त्रियां पराए व्यक्ति से बातचीत करती है, कटाक्षपूर्वक देखती है और अपने ह्रदय में पर पुरुष का चिंतन करती है, इस प्रकार चरित्रहीन स्त्रियों का प्रेम अनेक से होता है। 3: जो मुर्ख व्यक्ति माया के मोह में वशीभूत होकर यह सोचता है कि अमुक स्त्री उस पर आसक्त है, वह उस स्त्री के वश में होकर खेल की चिड़िया की भांति इधर-से-उधर नाचता फिरता है। 4: आचार्य चाणक्य का कहना है कि इस संसार में कोई भाग्यशाली व्यक्ति ही मोह-माया से छूटकर मोक्ष प्राप्त करता है। उनका कहना है -----'धन-वैभव को प्राप्त करके ऐसा कौन है जो इस संसार...

Chanakya Neeti - Fifteenth Chapter in Hindi (चाणक्य नीति - पन्द्रहवां अध्याय)

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Chanakya Neeti - Fifteenth Chapter  (चाणक्य नीति -  पन्द्रहवां अध्याय) 1: जिसका ह्रदय सभी प्राणियों पर दया करने हेतु द्रवित हो उठता है, उसे ज्ञान, मोक्ष, जटा और भस्म लगाने की क्या जरूरत है ? 2: जो गुरु एक ही अक्षर अपने शिष्य को पढ़ा देता है, उसके लिए इस पृथ्वी पर कोई अन्य चीज ऐसी महत्वपूर्ण नहीं है, जिसे वह गुरु को देकर उऋण हो सके। 3: दुष्टों और कांटो से बचने के दो ही उपाय है, जूतों से उन्हें कुचल डालना व उनसे दूर रहना। 4: गंदे वस्त्र धारण करने वाले, दांतो पर मैल जमाए रखने वाले, अत्यधिक भोजन करने वाले, कठोर वचन बोलने वाले, सूर्योदय से सूर्यास्त तक सोने वाले, चाहे वह साक्षात विष्णु ही क्यों न हो, लक्ष्मी त्याग देती है। 5: निर्धन होने पर मनुष्य को उसके मित्र, स्त्री, नौकर, हितैषी जन छोड़कर चले जाते है, परन्तु पुनः धन आने पर फिर से उसी के आश्रय लेते है। 6: अन्याय से उपार्जित किया गया धन दस वर्ष तक रहता है। ग्यारहवें वर्ष के आते ही जड़ से नष्ट हो जाता है। 7: समर्थ व्यक्ति द्वारा किया गया गलत कार्य भी अच्छा कहलाता है और नीच व्यक्ति के द्वारा किया गया अच्छा कार्य भी ग...

Chanakya Neeti - Fourteenth Chapter in Hindi (चाणक्य नीति - चौहदवा अध्याय)

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Chanakya Neeti - Fourteenth Chapter  (चाणक्य नीति -  चौहदवा अध्याय) 1: इस पृथ्वी पर तीन ही रत्न है -----जल, अन्न, और मधुर वचन ! बुद्धिमान व्यक्ति इनकी समझ रखता है, परन्तु मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ो को ही रत्न कहते है। 2: मनुष्य के अधर्म रूपी वृक्ष (अर्थात शरीर) के फल -----दरिद्रता, रोग, दुःख, बंधन (मोह-माया), व्यसन आदि है। 3: धन, मित्र, स्त्री, पृथ्वी, ये बार-बार प्राप्त होते है, परन्तु मनुष्य का शरीर बार-बार नहीं मिलता है। 4: यह एक निश्चित तथ्य है कि बहुत से लोगो का समूह ही शत्रु पर विजय प्राप्त करता है, जैसे वर्षा की धार को धारण करने वाले मेघों के जल को तिनको के द्वारा (तिनके का बना छप्पर) ही रोका जा सकता है। 5: पानी में तेल, दुष्ट व्यक्तियों में गोपनीय बातें, उत्तम पात्र को दिया गया दान और बुद्धिमान के पास शास्त्र-ज्ञान यदि थोड़ा भी हो तो स्वयं वह अपनी शक्ति से विस्तार पा जाता है। 6: धार्मिक कथा सुनने पर, श्मशान में चिता को जलते देखकर, रोगी को कष्ट में पड़े देखकर जिस प्रकार वैराग्य भाव उत्पन्न होता है, वह यदि स्थिर रहे तो यह सांसारिक मोह-माया व्यर्थ लगने लगे, पर...

Chanakya Neeti - Thirteenth Chapter in Hindi (चाणक्य नीति - तेरहवा अध्याय)

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Chanakya Neeti - Thirteenth Chapter  (चाणक्य नीति -  तेरहवा अध्याय) 1: उत्तम कर्म करते हुए एक पल का जीवन भी श्रेष्ठ है, परन्तु दोनों लोकों (लोक-परलोक) में दुष्कर्म करते हुए कल्प भर के जीवन (हजारों वर्षो का जीना) भी श्रेष्ठ नहीं है। 2: बीते हुए का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य में जो कुछ होने वाला है, उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। आए हुए समय को देखकर ही विद्वान लोग किसी कार्य में लगते है। 3: उत्तम स्वभाव से ही देवता, सज्जन और पिता संतुष्ट होते है। बंधु-बांधव खान-पान से और श्रेष्ठ वार्तालाप से पंडित अर्थात विद्वान प्रसन्न होते है। मनुष्य को अपने मृदुल स्वभाव को बनाए रखना चाहिए। 4: अहो ! आश्चर्य है कि बड़ो के स्वभाव विचित्र होते है, वे लक्ष्मी को तृण के समान समझते है और उसके प्राप्त होने पर, उसके भार से और भी अधिक नम्र हो जाते है। 5: जिसे किसी से लगाव है, वह उतना ही भयभीत होता है। लगाव दुःख का कारण है। दुःखो की जड़ लगाव है। अतः लगाव को छोड़कर सुख से रहना सीखो। 6: भविष्य में आने वाली संभावित विपत्ति और वर्तमान में उपस्थित विपत्ति पर जो तत्काल विचार करके उसका समाधान खोज ...