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जनवरी, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

महाभारत का चक्रव्यूह तथा दूसरे व्यूह (Chakracvyuh of Mahabharat and other Vyuh Warfare)

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इस लेख में महाभारत युद्ध के विभिन्न व्यूह को दर्शया गया है| ●●● वज्र व्यूह ●●● महाभारत युद्ध के प्रथम दिन अर्जुन ने अपनी सेना को इस व्यूह के आकार में सजाया था... इसका आकार देखने में इन्द्रदेव के वज्र जैसा होता था अतः इस प्रकार के व्यूह को "वज्र व्यूह" कहते हैं! ●●●क्रौंच व्यूह ●●● क्रौंच एक पक्षी होता है... जिसे आधुनिक अंग्रेजी भाषा में Demoiselle Crane कहते हैं... ये सारस की एक प्रजाति है...इस व्यूह का आकार इसी पक्षी की तरह होता है... युद्ध के दूसरे दिन युधिष्ठिर ने पांचाल पुत्र को इसी क्रौंच व्यूह से पांडव सेना सजाने का सुझाव दिया था... राजा द्रुपद इस पक्षी के सर की तरफ थे, तथा कुन्तीभोज इसकीआँखों के स्थान पर थे... आर्य सात्यकि की सेना इसकी गर्दन के स्थान परथे... भीम तथा पांचाल पुत्र इसके पंखो (Wings) के स्थान पर थे... द्रोपदी के पांचो पुत्र तथा आर्य सात्यकि इसके पंखो की सुरक्षा में तैनात थे...इस तरह से हम देख सकते है की, ये व्यूह बहुत ताकतवर एवं असरदार था... पितामह भीष्म ने स्वयं इस व्यूह से अपनी कौरव सेना सजाई थी... भूरिश्रवा तथा शल्य इसके पंखो की सुरक्षा कर रहे

हस्त-मुद्रा-चिकित्सा(hasta mudra science)

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मानव-सरीर अनन्त रहस्योंसे भरा हुआ है । शरीरकी अपनी एक मुद्रामयी भाषा है । जिसे करनेसे शारीरिक स्वास्थ्य-लाभ में सहयोग होता है । यह शरीर पंचतत्त्वोंके योगसे बना है । पाँच तत्त्व ये हैं- (1) पृथ्वी, (2) जल, (3) अग्नि, (4) वायु, एवं (5) आकाश । हस्त-मुद्रा-चिकित्साके अनुसार हाथ तथा हाथोंकी अँगुलियों और अँगुलियोंसे बननेवाली मुद्राओंमें आरोग्यका राज छिपा हुआ है । हाथकी अँगुलियोंमें पंचतत्त्व प्रतिष्ठित हैं । ऋषि-मुनियोंने हजारों साल पहले इसकी खोज कर ली थी एवं इसे उपयोगमें बराबर प्रतिदिन लाते रहे, इसीलिये वे लोग स्वस्थ रहते थे । ये शरीरमें चैतन्यको अभिव्यक्ति देनेवाली कुंजियाँ हैं । अँगुली में पंच तत्व : हाथों की 10 अँगुलियों से विशेष प्रकार की आकृतियाँ बनाना ही हस्त मुद्रा कही गई है। हाथों की सारी अँगुलियों में पाँचों तत्व मौजूद होते हैं जैसे अँगूठे में अग्नि तत्व, तर्जनी अँगुली में वायु तत्व, मध्यमा अँगुली में आकाश तत्व, अनामिका अँगुली में पृथ्वी तत्व और कनिष्का अँगुली में जल तत्व। अँगुलियों के पाँचों वर्ग से अलग-अलग विद्युत धारा बहती है। इसलिए मुद्रा विज्ञान में जब अँगुलिय

प्राचीन भारत के आविष्कार तथा संस्कृत (Ancient Indian Technology with Sanskrit)

2005 में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जब इलाहाबाद आये तो महर्षि भारद्धाज आश्रम देखने की इच्छा उन्होंने प्रगट की और उन्होंने बताया कि महर्षि भारद्धाज ने सर्वप्रथम विमान शास्त्र की रचना की थी। महाकुंभ के अवसर पर देश-देशांतर के सभी विद्धान प्रयाग आते थे और इसी भारद्धाज आश्रम में महीने दो महीने रहकर अपने-अपने शोध और खोज पर चर्चा करते थे जिससे उनको जनकल्याण में लगाया जा सके। सोशल नेटवर्किंग साईट पर जब किसी ने अरब के किसी व्यक्ति का नाम देते हुए कहा कि सबसे पहले इन्होंने विमान की खोज की तो आश्‍चर्य हुआ। प्राचीन काल में वेद, मंत्र, उपनिषद किसने लिखे ? उन भारतीयों ने अपने से अधिक अपनी कृति से प्रेम किया होगा यही कारण है कि अपना नाम प्रकाशित नहीं किया जबकि आप एक छोटी सी कविता भी लिख दें तो छपवाना चाहेंगे। “ वैज्ञानिकाश्चं: कपिल: कणाद: सुश्रुतस्त था। चरको भास्क्राचार्यो वाराहमिहिर: सुधी:। नागार्जुनो भरद्धाजो बसुर्वुध:। ध्येायो वेंकटरामश्चस विज्ञा रामानुजादय:। पश्चिम में एक धारणा प्रचलित की गई है कि भारत में साहित्य में अच्छा कार्य हुआ है। रामायण, महाभारत, मेघदूत और शकुंतला विलुप्त नही

शिवपुराण के अनुसार बिल्वपत्र(bilvapatra according to shivpurana)

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शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग पर कई प्रकार की सामग्री फूल-पत्तियां चढ़ाई जाती हैं। इन्हीं में से सबसे महत्वपूर्ण है बिल्वपत्र। बिल्वपत्र से जुड़ी खास बातें जानने के बाद आप भी मानेंगे कि बिल्व का पेड बहुत चमत्कारी है- पुराणों के अनुसार रविवार के दिन और द्वादशी तिथि पर बिल्ववृक्ष का विशेष पूजन करना चाहिए। इस पूजन से व्यक्ति से ब्रह्महत्या जैसे महापाप से भी मुक्त हो जाता है। क्या आप जानते हैं कि बिल्वपत्र छ: मास तक बासी नहीं माना जाता। इसका मतलब यह है कि लंबे समय शिवलिंग पर एक बिल्वपत्र धोकर पुन: चढ़ाया जा सकता है। आयुर्वेद के अनुसार बिल्ववृक्ष के सात पत्ते प्रतिदिन खाकर थोड़ा पानी पीने से स्वप्न दोष की बीमारी से छुटकारा मिलता है। इसी प्रकार यह एक औषधि के रूप में काम आता है। शिवलिंग पर प्रतिदिन बिल्वपत्र चढ़ाने से सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। भक्त को जीवन में कभी भी पैसों की कोई समस्या नहीं रहती है। शास्त्रों में बताया गया है जिन स्थानों पर बिल्ववृक्ष हैं वह स्थान काशी तीर्थ के समान पूजनीय और पवित्र है। ऐसी जगह जाने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। बिल्वपत्र उत्तम वायु

महाभारतकालीन भारतवर्ष के नगरों के प्राचीन नाम (Name of ancient Indian Cities during Mahabharat period)

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 :- यह आर्यवर्त राष्ट्र उत्तर में हिमालय से दक्षिण श्रिलंका तक फैला था , यहाँ बर्मा से लेकर अफगानिस्तान तक जिसमें आधा भाग ईरान का भी समाविष्ट था । जो भीम के हिस्से आया :- पांचाल (रुहेलखण्ड्, उत्तर प्रदेश के हरितप्रदेश का भाग),गंडक,विदेह (नेपाल का भाग),दशार्ण (छत्तीसगड़),पुलिंद (हरिद्वार के आसपास का स्थान),चेदि (बुंदेलखण्ड),कोशल (अयोध्या),उत्तर कोशल,मल्ल (मलावा),भल्लाट,क्रथ,मत्स्य(जयपुर),मलद (शाहाबाद),बरार,शुक्तिमान् ,वत्सभूमि (कुसुम्भी),निषाद (मारवाड़),दक्षीण मल्ल,मगध (मध्यप्रदेश का कुछ भाग),पुण्ड्र (बंगाल),कौशीकि-कच्छ (पूर्णिया),बंग,ताम्रलिप्त,सुह्म (राढ़ा,बंगाल और कलिंग के बीच का स्थान),लौहित्य(ब्रह्मपुत्र) आदि । जो अर्जुन के हिस्से आया :- कुलिन्द (गढ़वाल और सहारनपुर), आनर्त (गुजरात जो कि- खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान वाला),कालकूट, शाकल (सियालकोट), प्रागज्योतिष (असम), उलूक, देवप्रस्थ, काशमीर, दार्व, कोकनद, अभिसारी (राजौरी), उरगा (हजारा), सिंहपुर (पिण्डदादनखाँ के पास, पाकिस्तान), बाह्लीक, दरद(दर्दिस्तान जो काशमीर के उत्तर में है), काम्बोज (अफगानिस्तान), किम्पुरुष (नैपाल),

वेद और वैदिक आर्य ग्रन्थों में गुरूत्वाकर्षण के नियम ( Law Of Gravitation from ancient India )

वेद और वैदिक आर्ष ग्रन्थों में गुरूत्वाकर्षण के नियम को समझाने के लिये पर्याप्त सूत्र हैं । परन्तु जिनको न जानकर हमारे आजकल के युवा वर्ग केवल पाश्चात्य वैज्ञानिकों के पीछे ही श्रद्धाभाव रखते हैं । जबकि यह करोड़ों वर्ष पहले वेदों में सूक्ष्म ज्ञान के रूप में ईश्वर ने हमारे लिये पहले ही वर्णन कर दिया है । तो ऐसे मूर्ख लोग जिसको Newton's Law Of Gravitation कहते फिरते हैं । वह वास्तव में Nature's Law Of Gravitation होना चाहिये । तो लीजिये हम अनेकों प्रमाण देते हैं कि हमारे ऋषियों ने जो बात पहले ही वेदों से अपनी तपश्चर्या से जान ली थी उसके सामने ये Newton महाराज कितना ठहरते हैं । आधारशक्ति :- बृहत् जाबाल उपनिषद् में गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त को आधारशक्ति नाम से कहा गया है । इसके दो भाग किये गये हैं :- (१) ऊर्ध्वशक्ति या ऊर्ध्वग :- ऊपर की ओर खिंचकर जाना । जैसे अग्नि का ऊपर की ओर जाना । (२) अधःशक्ति या निम्नग :- नीचे की ओर खिंचकर जाना । जैसे जल का नीचे की ओर जाना या पत्थर आदि का नीचे आना । आर्ष ग्रन्थों से प्रमाण देते हैं :- (१) यह बृहत् उपनिषद् के सूत्र हैं :- अग्नीषोमात्मकं

भोजन करने के शास्त्रीय नियम (Rules for eating according to Shaastras)

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1.पांच अंगो ( दो हाथ , २ पैर , मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करे ! 2. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है ! 3. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है !किउंकि पाचन क्रिया की जठराग्नि सूर्योदय से 2 ० घंटे बाद तक एवं सूर्यास्त से 2 : 3 0 घंटे पहले तक प्रवल रहती है 4. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए ! 5. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है ! 6 . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है ! 7. शैय्या पर , हाथ पर रख कर , टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए ! 8. मल मूत्र का वेग होने पर,कलह के माहौल में,अधिक शोर में,पीपल,वट वृक्ष के नीचे,भोजन नहीं करना चाहिए ! 9 परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए ! 10. खाने से पूर्व अन्न देवता , अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के , उनका धन्यवाद देते हुए , तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए ! 11. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से, मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर ( गाय , कुत्ता , और

आयुर्वेद के अनुसार बच्चे के जन्म का आधार (birth of boy or girl basis on Ayuraveda of ancient India)

हमारे पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है। हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं। * चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है। * पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी। * छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा। * सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी। * आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है। * नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है। * दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है। * ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है। * बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है। * तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है। * चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है। * पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से

कृष्ण और बौद्ध काल के बीच के खोया हुआ इतिहास (Forgotten history between Krishna and Budhdha period)

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मध्‍यकाल में भारतीय इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा गया। तक्षशिला और पाटलीपुत्र के ध्वंस के बाद महाभारत युद्ध और बौद्ध काल के बीच के हिंदू इतिहास के अब बस खंडहर ही बचे हैं। विदेशी इतिहासकारों ने जानबूझकर इस काल के इतिहास को विरोधाभासी बनाया। क्योंकि उन्हें भारत में नए धर्म को स्थापित करना था। दरअसल बुद्ध के पूर्व के संपूर्ण इतिहास को नष्ट किए जाने का संपूर्ण प्रयास किया गया। इस धूमिल से इतिहास को इतिहासकारों ने खुदाईयों और ग्रंथों की खाक छानते हुए क्रमबद्ध करने का प्रयास किया है। हड़प्पा, सिंधु और मोहनजोदड़ों सभ्यता का प्रथम चरण 3300 से 2800 ईसा पूर्व, दूसरा चरण 2600 से 1900 ईसा पूर्व और तीसरा चरण 1900 से 1300 ईसा पूर्व तक रहा। इतिहासकार मानते हैं कि यह सभ्यता काल 800 ईस्वी पूर्व तक चलता रहा। प्रथम चरण के काल में महाभारत हुई, दूसरे चरण के काल में मिस्र के फराओं और भारत के कुरु और पौरवो के राजवंश थे। तीसरे चरण में यहूदी धर्म के संस्थापक इब्राहिम, मूसा, सुलेमान ने यहूदी वंशों का निर्माण किया तो भारत में सभी वंशों के 16 महाजनपदों का उदय हुआ। हड़प्पा से पहले सिंधु नदी के आसपास मेहरगढ़ की

तक्षशिला विश्वविद्यालय (takshila university from Ancient vedic Bharat)

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तक्षशिला विश्वविद्यालय वर्तमान पश्चिमी पाकिस्तान की राजधानी रावलपिण्डी से 18 मील उत्तर की ओर स्थित था। जिस नगर में यह विश्वविद्यालय था उसके बारे में कहा जाताहै कि श्री राम के भाई भरत के पुत्र तक्ष ने उस नगर की स्थापना की थी। यह विश्व का प्रथम विश्विद्यालय था जिसकी स्थापना 700 वर्ष ईसा पूर्व में की गई थी। तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे। यहां 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था। 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के चिकित्सा शास्त्र का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकास विभिन्न रूपों में हुआ था। इसका कोई एक केन्द्रीय स्थान नहीं था, अपितु यह विस्तृत भू भाग में फैला हुआ था। विविध विद्याओं के विद्वान आचार्यो ने यहां अपने विद्यालय तथा आश्रम बना रखे थे। छात्र रुचिनुसार अध्ययन हेतु विभिन्न आचार्यों के पास जाते थे। महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में यहां वेद-वेदान्त, अष्टादश विद्याएं, दर्शन, व्याकरण, अर्थशास्त्र,राजनीति, युद्धविद्या,श

नारिलता फूल का आश्चर्यजनक सत्य (narilata flower from himalaya india)

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नारीलता फूल का पौधा भारत में हिमालय क्षेत्र में पाया जाता है. और वे 20 साल के अंतराल पर खिलते हैं। यह फूल एक औरत के आकार का होता है यह एक दुर्लभ फूल है...आश्चर्यजनक..!! कुछ भी कहिये प्राकृति भी ग़ज़ब गज़ब के रंग दिखाती है जरा इस अनोखे फूल को हीं देखिये इसका अकार देखिये इसकी बनावट को देखिये शायद आपको पेड़ो पर यह लटकी हुई गुडिया सी नज़र आ रही किसी इंसान की इंसानी हरकत लगे..... लेकिन ऐसा नहीं है..... यह हिमालय श्रीलंका और थाईलेंड में एक पेड में लगने वाला फूल है जिसे उपरी हिमालय में ...नारीलता फूल के नाम से जाना जाता है

स्वस्तिक का महत्त्व(Swastika of India)

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विभिन्न धर्मों के उपासना-स्थलों के ऊर्जास्तरों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया तो चर्च में क्रॉस के इर्दगिर्द लगभग 10000 बोविस ऊर्जा का पता चला। मस्जिदों में इसका स्तर 11000 बोविस रिकार्ड किया गया है। शिवमंदिर में यह स्तर 16000 बोविस से अधिक प्राप्त हुआ। हिन्दू धर्म के प्रधान चिह्न स्वस्तिक में यह ऊर्जा 10,00000 (दस लाख) बोविस पायी गयी। इससे स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति में इस चिह्न को इतना महत्त्व क्यों दिया गया है और क्यों इसे धार्मिक कर्मकांडों के दौरान, पर्व-त्यौहारों में एवं मुंडन के उपरान्त छोटे बच्चों के मुंडित मस्तक पर, गृह-प्रवेश के दौरान दरवाजों पर और नये वाहनों की पूजा व अर्चना के समय वाहनों पर पवित्र प्रतीक के रूप में अंकित किया जाता है।

मृत्यु के बाद का जीवन (What happens after death, Life after death)

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मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद स्वर्ग-नरक की मान्यता है। पुराणों के अनुसार जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, वह स्वर्ग जाता है, जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है, उसे यमदूत नरक में ले जाते हैं। सबसे पहले जीवात्मा को यमलोक ले जाया जाता है। वहां यमराज उसके पापों के आधार पर उसे सजा देते हैं। मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में :: मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेता है। • गरुड़ पुराण के अनुसार जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है। पापी