रविवार, 16 सितंबर 2018

चौबीस देवताओं के चौबीस गायत्री मन्त्र


gayatri mantra
‘गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है, केशव से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है। गायत्री मन्त्र के जप से श्रेष्ठ कोई जप न आज तक हुआ है और न होगा।’

सर्वफलप्रदा, देवताओं और ऋषियों की उपास्य गायत्री

’करोड़ों मन्त्रों में सर्वप्रमुख मन्त्र गायत्री है जिसकी उपासना ब्रह्मा आदि देव भी करते हैं। यह गायत्री ही वेदों का मूल है।’
गायत्री यद्यपि एक वैदिक छन्द है, परन्तु इसकी एक देवी के रूप में मान्यता है। ‘समस्त लोकों में परमात्मस्वरूपिणी जो ब्रह्मशक्ति विराज रही है, वही सूक्ष्म-सत् प्रकृति के रूप में गायत्री के नाम से जानी जाती है।’ गायत्री के तीन रूप हैं–सरस्वती, लक्ष्मी एवं काली।
ह्रीं श्रीं क्लीं चेति रूपेभ्यस्त्रिभ्यो हि लोकपालिका।
भासते सततं लोके गायत्री त्रिगुणात्मिका।। (गायत्रीसंहिता)
अर्थ–ह्रीं–अर्थात् ज्ञान, बुद्धि, विवेक, प्रेम, संयम, सदाचार। श्रीं–धन, वैभव, पद, प्रतिष्ठा, भोग, ऐश्वर्य। क्लीं–अर्थात् स्वास्थ्य, बल, साहस, पराक्रम, पुरुषार्थ, तेज। इन तीन रूपों एवं विशेषताओं से पालन करने वाली त्रिगुणात्मक ईश्वरीय शक्ति ही गायत्री है।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा वेद भी गायत्री का ध्यान और जप करते हैं, अत: गायत्री को ‘वेदोपास्या’ भी कहते हैं। ब्रह्माजी ने तराजू के एक पलड़े में चारों वेदों को और दूसरे में गायत्री को रखकर तौला तो गायत्री चारों वेदों की तुलना में भारी सिद्ध हुई। इसीलिए ऋषियों ने गायत्री उपासना को मनुष्यों के लिए वैसे ही आवश्यक बताया जैसे कि सांस लेना, भोजन ग्रहण करना और निद्रा आदि।
ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र आदि बड़े-बड़े दिव्य अस्त्र इसी गायत्री मन्त्र के अनुलोम-विलोम विधि से तैयार किए जाते हैं। सन्ध्यावन्दन के समय गायत्री मन्त्र के उच्चारण के साथ दिया गया अर्घ्य ऐसे ही ब्रह्मास्त्र का रूप धारणकर सूर्य के सभी शत्रु राक्षसों का सफाया करके उनके उदित होने के लिए निष्कण्टक मार्ग बना देता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब विश्वामित्र ने महर्षि वशिष्ठ के वध के लिए भगवान शंकर से प्राप्त पचासों दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया तब वशिष्ठ ने केवल ब्रह्मदण्ड से ही उन सब दिव्यास्त्रों को निष्फल कर दिया। ऋषि वशिष्ठ ने इस ब्रह्मदण्ड का निर्माण गायत्री मन्त्र की साधना से ही किया था।
स्कन्दपुराण में महर्षि व्यास ने कहा है–‘गायत्री ही तप है, गायत्री ही योग है, गायत्री ही सबसे बड़ा ध्यान और साधन है। इससे बढ़कर सिद्धिदायक साधन और कोई नहीं है।’

गायत्री सद्बुद्धिदायक मन्त्र है

ॐ भू: भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्।।
अर्थ–‘पृथ्वीलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक में व्याप्त उस श्रेष्ठ परमात्मा का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धि को सत् की ओर प्रेरित करे।’
गायत्री मन्त्र में ईश्वर से सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना की गई है। गायत्री मन्त्र की रचना ऐसे वैज्ञानिक आधार पर हुई है कि उसकी साधना से अपने भीतर छुपे अनेक गुप्त शक्ति केन्द्र खुल जाते हैं। वह साधक के मन को, अंत:करण को, मस्तिष्क को और विचारों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है और सद्बुद्धि उत्पन्न करता है, जिसके कारण कुबुद्धि का अज्ञानान्धकार दूर होता है।
देवता पशुपालक की तरह दण्ड लेकर किसी की रक्षा के लिए उसके पीछे नहीं चलते, वरन् जिसकी रक्षा करनी होती है, उसे सद्बुद्धि दे देते हैं। गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों में २४ अमूल्य शिक्षा संदेश भरे हुए हैं। वेदमाता गायत्री का मन्त्र छोटा-सा है पर इतने थोड़े में ही अनन्त ज्ञान का समुद्र भरा पड़ा है।

गायत्री उपासना पारस पत्थर के समान

गायत्री उपासना पारस पत्थर के समान है। पारस का महत्व इसलिए है कि वह लोहे की तुच्छता को सोने की महानता में बदल देता है। गायत्री उपासना से भी साधक के अंत:करण में जो प्रकाश जगता है, वह साहस और पुरुषार्थ में बदलकर मानव को ऊंचे उद्देश्यों की प्राप्ति कराकर उसका कायाकल्प कर देता है। प्राचीनकाल में सावित्री ने एक वर्ष तक गायत्री जप करके वह शक्ति प्राप्त की थी जिससे वह अपने मृत पति सत्यवान के प्राणों को यमराज से लौटा सकी। गान्धारी आंखों पर पट्टी बांधकर तप करती थीं जिससे उनके नेत्रों में वह शक्ति उत्पन्न हो गयी कि उनके दृष्टिपातमात्र से दुर्योधन का शरीर अभेद्य हो गया। जिस जंघा पर उसने लज्जावश कपड़ा डाल लिया, वह कच्ची रह गयी और उसी पर प्रहार करके भीम ने दुर्योधन को मारा था। देवी अनुसुइया ने तप से ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नन्हे बालक बना दिया। सुकन्या की तपस्या से जीर्ण-शीर्ण च्यवन ऋषि तरुण हो गए।

ब्रह्म गायत्री एवं देव गायत्री

गायत्री के तन्त्र ग्रन्थों में २४ गायत्रियों का वर्णन है। चौबीस देवताओं के लिए एक-एक गायत्री है। गायत्री छन्द में ग्रथित होने से उन्हें ‘गायत्री’ कहते हैं। इस प्रकार २४ गायत्रियों द्वारा २४ देवताओं से सम्बन्ध स्थापित किया गया है।
गायत्री त्रिपदा कही जाती है। गायत्री मन्त्र के २४ अक्षर तीन पदों में विभक्त हैं। गायत्री मन्त्र के ‘विद्महे’, ‘धीमहि’ और ‘धियो यो न: प्रचोदयात्’ शब्दों को लेकर चौबीस देवताओं की गायत्री रची गयी है। इससे गायत्री मन्त्र की पवित्रता, उच्चता और सर्वश्रेष्ठता सिद्ध होती है।
‘धीमहि’ कहते हैं–ध्यान को। पर किसका ध्यान? उस मंगलमय प्रकाशवान परमात्मा का ध्यान, जिसको हृदय में धारण करने पर सब प्रकार की सुख-शान्ति, ऐश्वर्य, प्राण-शक्ति और परमपद की प्राप्ति होती है।
यो न: प्रचोदयात्’ में कामनाओं की ओर संकेत किया गया है। मनुष्य कामनाओं से बना हुआ है। कामना (इच्छा) के कारण ही यह संसार चल रहा है। परन्तु मनुष्य की कामनाएं स्वार्थ से ऊपर उठकर धर्ममय होनी चाहिए जो सबके लिए हितकर हों। यही गायत्री का स्वरूप है। गायत्री मन्त्र में परमात्मा से सद्बुद्धि व श्रेष्ठ कर्मों की ओर प्रेरित करने की कामना की गयी है।
गायत्री-मन्त्र में चौबीस शक्तियां गुंथी हुई हैं। गायत्री मन्त्र की उपासना करने से उन शक्तियों का लाभ साधक को मिलता है। चौबीस देवताओं की चौबीस शक्तियां हैं। मनुष्य को जिस शक्ति की कामना हो या इन शक्तियों में से किसी शक्ति की अपने में कमी का अनुभव होता हो तो उसे उस शक्ति वाले देवता की उपासना करनी चाहिए। उस देवता का ध्यान करते हुए देव गायत्री का जप करना चाहिए। इनके जप से उस देवता के साथ साधक का विशेष रूप से सम्बन्ध स्थापित हो जाता है और उस देव से सम्बन्ध रखने वाली चैतन्य शक्तियां, सिद्धियां साधक को प्राप्त हो जाती हैं। उस शक्ति के देवता की गायत्री का जप भी मूल गायत्री जप के साथ करने से लाभ होता है।
जैसे दूध में सभी पोषक तत्त्व होते हैं और दूध पीने वाले को सभी पोषक तत्त्वों का लाभ मिलता है। परन्तु यदि किसी को किसी विशेष तत्त्व की आवश्यकता होती है तो वह दूध के उसी विशेष तत्त्व का ही सेवन करता है। किसी को यदि चिकनाई की आवश्यकता है तो वह दूध के चिकनाई वाले भाग घी का सेवन करता है। किसी को छाछ की आवश्कता है तो वह दूध के छाछ वाले अंश को ग्रहण करता है। रोगियों को दूध फाड़कर उसका पानी देते हैं। उसी प्रकार विशेष शक्तियों  की आवश्यकता होने पर मनुष्य को उसी शक्ति से सम्बन्धित देव की आराधना करनी चाहिए।
जिस देवता की जो गायत्री है उसका दशांश जप गायत्री मन्त्र साधना के साथ करना चाहिए। देवताओं की गायत्रियां वेदमाता गायत्री की छोटी-छोटी शाखाएं है, जो तभी तक हरी-भरी रहती हैं, जब तक वे मूलवृक्ष के साथ जुड़ी हुई हैं। वृक्ष से अलग कट जाने पर शाखा निष्प्राण हो जाती है, उसी प्रकार अकेले देव गायत्री भी निष्प्राण होती है, उसका जप महागायत्री (गायत्री मन्त्र) के साथ ही करना चाहिए।

चौबीस देवताओं के गायत्री मन्त्र

१. गणेश गायत्री—ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।
२. नृसिंह गायत्री—ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि। तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात्।
३. विष्णु गायत्री—ॐ त्रैलोक्यमोहनाय विद्महे कामदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्।
४. शिव गायत्रीॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।
५. कृष्ण गायत्री—ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात्।
६. राधा गायत्री–ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि। तन्नो राधा प्रचोदयात्।
७. लक्ष्मी गायत्री–ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे  विष्णुप्रियायै धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।
८. अग्नि गायत्री–ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि। तन्नो अग्नि: प्रचोदयात्।
९. इन्द्र गायत्री–ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि। तन्नो इन्द्र: प्रचोदयात्।
१०. सरस्वती गायत्री–ॐ सरस्वत्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्।
११. दुर्गा गायत्री–ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्।
१२. हनुमान गायत्री–ॐ अांजनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि।  तन्नो मारुति: प्रचोदयात्।
१३. पृथ्वी गायत्री–ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्त्रमूत्यै धीमहि। तन्नो पृथ्वी प्रचोदयात्।
१४. सूर्य गायत्री–ॐ आदित्याय विद्महे सहस्त्रकिरणाय धीमहि। तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्।
१५. राम गायत्री–ॐ दशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि। तन्नो राम: प्रचोदयात्।
१६. सीता गायत्री–ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि। तन्नो सीता प्रचोदयात्।
१७. चन्द्र गायत्री–ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्त्वाय धीमहि। तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात्।
१८. यम गायत्री–ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि। तन्नो यम: प्रचोदयात्।
१९. ब्रह्मा गायत्री–ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसारुढ़ाय धीमहि। तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।
२०. वरुण गायत्री–ॐ जलबिम्वाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि। तन्नो वरुण: प्रचोदयात्।
२१. नारायण गायत्री–ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो नारायण: प्रचोदयात्।
२२. हयग्रीव गायत्री–ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि। तन्नो हयग्रीव: प्रचोदयात्।
२३. हंस गायत्री–ॐ परमहंसाय विद्महे महाहंसाय धीमहि। तन्नो हंस: प्रचोदयात्।
२४. तुलसी गायत्री–ॐ श्रीतुलस्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि। तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।
गायत्री साधना का प्रभाव तत्काल होता है जिससे साधक को आत्मबल प्राप्त होता है और मानसिक कष्ट में तुरन्त शान्ति मिलती है। इस महामन्त्र के प्रभाव से आत्मा में सतोगुण बढ़ता है।

ध्यान देने योग्य बातें

गायत्री जप में आसन का भी विचार किया जाता है। बांस, पत्थर, लकड़ी, वृक्ष के पत्ते, घास-फूस के आसनों पर बैठकर जप करने से सिद्धि प्राप्त नहीं होती, वरन् दरिद्रता आती है। गायत्री शक्ति का ध्यान करके करमाला, रुद्राक्ष या तुलसी की माला में जप करना चाहिए। मन में मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए। न जीभ हिले, न होंठ।
गायत्री की महिमा के सम्बन्ध में क्या कहा जाए। ब्रह्म की जितनी महिमा है, वह सब गायत्री की भी मानी जाती हैं। वेदमाता गायत्री से यही विनम्र प्रार्थना है कि वे दुर्बुद्धि को मिटाकर सबको सद्बुद्धि प्रदान करे

शनिवार, 10 जून 2017

वर्ण और जाति का भेद

भारतीय समाज का विभक्ति करण वर्ण और जाति आधारित है, इसके लिए किसी साक्छ्य की जरूरत नहीं क्योंकि आज की परिस्थिति में यह एक सारभोम्य सत्य है । लेकिन आइये यह जानने का प्रयास करते हैं कि भारतीय समाज में वर्ण और जाति में आखिर भेद क्या है ? कैसे कभी कभी ये दोनों एक दुसरे का रूप लेते और प्रतिरूप बदलते  प्रतीत होते है ।
वर्ण और जाति

वर्ण क्या है? जाति क्या है? सीधे और सरल भाषा में अगर कहा जाय तो इसे कुछ ऐसे वर्णित किया जा सकता है ।
वैदिक काल में  श्रम विभाजन हेतु समाज को मोटे तौर पर  चार वर्णों में विभक्त किया गया था। ये चार वर्ण हैं : ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य एवं शूद्र।
मनुस्मृति के अनुशार “जन्मना जायते शूद्र:, संस्काराद् द्विज उच्यते ” अर्थात मनुष्य का जन्म  शूद्र के रूप में होता है तथा वह संस्कारों के ही बल पर द्विज यानि कि ब्राह्मण बनता है।
मनुस्मृति के ही अनुशार “विप्राणं ज्ञानतो ज्येष्ठम् क्षत्रियाणं तु वीर्यतः” अर्थात् ब्राह्मण की प्रतिष्ठा ज्ञान से है तथा क्षत्रिय की बल वीर्य से होती है । यानी जिसमे ज्ञान नहीं वह ब्राह्मण नहीं, जिसमे बल वीर्य नहीं वह क्षत्रिय कहलाने योग्य नहीं ।
हिंदू शास्त्र ऋग्वेद के 10 वें मंडल के पुरुषसूक्त के अनुसार ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से राजन्य (क्षत्रिय), जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। यह एक लौकिक वर्णन है जिसकी विवेचना मनु आदि स्मृतिकारों ने अपने अपने ग्रंथों में विस्तार से किये हैं ।
आर्य समाज वर्ण ब्यवस्था पर आधारित रहा है । इस वर्णव्यवस्था में पुरोहित तथा अध्यापक वर्ग ब्राह्मण, शासक तथा सैनिक वर्ग क्षत्रिय, उत्पादक वर्ग वैश्य और शिल्पी एवं सेवक वर्ग शूद्रवर्ण कहलाया गया हैं।
जाति व्यक्ति के समाज, जिसमें जन्म हुआ हो, को कहते हैं। यह वर्ण से भिन्न है ।  हालाकि कि कई स्थानों पर वर्ण और जाति को एक दुसरे के रूप में भी प्रयुक्त किया जाता रहा है ।
जाति ब्यवस्था वर्ण से उपजी मानी जाती है । हालकी आर्यों के आगमन से पहले कुछ विद्वानों के मतानुशार जाति का प्रादुर्भाव अनार्यों या भारतीय जनजातिओं में पहले ही हो चूका था । इस मत के समर्थकों का कहना है कि ‘माया’, ‘जीवतत्ववाद’ ‘अभिनिषेध’ (टैबू) और जादू आदि की भावनाओं से प्रभावित विभिन्न समूह जब एक दूसरे के संपर्क में आए तो वे अपने विश्वास, संस्कृति, प्रजापति, धार्मिक कर्मकांड आदि के कारण एक दूसरे से पृथक्‌ बने रहे। और इस तरह जाति या एक पृथक समूह का निर्माण शुरू हुवा था । आर्यों के आगमन के बाद कालांतर में वर्ण ब्यवस्था के साथ जाति ब्यावाथा एक मूर्त रूप में सामने आई, जो आर्यों और अनार्यों की विभिन्न सामाजिक इकाइयों के आपसी मिलाप के परिणाम स्वरुप उत्पन्न हुई थी ।
जाति की उतपत्ति एक स्वायत्त ईकाई के रूप में धीरे धीरे सामने आई थी । परंपरागत रूप में जातियाँ स्वायत्त सामाजिक इकाइयाँ हैं जिनके अपने आचार तथा नियम हैं और जो एक दुसरे से अस्पस्टतः भिन्न हैं ।
भारतीय समाज जातीय सामाजिक इकाइयों से गठित और विभक्त है। श्रमविभाजनगत आनुवंशिक समूह भारतीय ग्राम की कृषिकेंद्रित व्यवस्था की विशेषता रही है। यहाँ की सामाजिक व्यवस्था में श्रमविभाजन संबंधी विशेषीकरण जीवन के सभी अंगों में अनुस्यूत है और आर्थिक कार्यों का ताना बाना इन्हीं आनुवंशिक समूहों से बनता है। यह जातीय समूह एक ओर तो अपने आंतरिक संगठन से संचालित तथा नियमित है और दूसरी ओर उत्पादन सेवाओं के आदान प्रदान और वस्तुओं के विनिमय द्वारा परस्पर संबद्ध हैं। समान पंमरागत पेशा या पेशे, समान धार्मिक विश्वास, प्रतीक सामाजिक और धार्मिक प्रथाएँ एवं व्यवहार, खानपान के नियम, जातीय अनुशासन और सजातीय विवाह इन जातीय समूहों की आंतरिक एकता को स्थिर तथा दृढ़ करते हैं। इसके अतिरिक्त पूरे समाज की दृष्टि में प्रत्येक जाति का सोपानवत्‌ सामाजिक संगठन में एक विशिष्ट स्थान तथा मर्यादा है जो इस सर्वमान्य धार्मिक विश्वास से पुष्ट है कि प्रत्येक मनुष्य की जाति तथा जातिगत धंधे दैवी विधान से निर्दिष्ट हैं और व्यापक सृष्टि के अन्य नियमों की भाँति प्रकृत तथा अटल हैं ।
वर्ण और जाति का भेद
जातियों की संख्या के बारे में अगर बात की जाय तो ये असीम प्रतीत होती हैं ।  श्रीधर केतकर के अनुसार केवल ब्राह्मणों की 800 से अधिक अंतर्विवाही जातियाँ हैं। और ब्लूमफील्ड का मत है कि ब्राह्मणों में ही दो हजार से अधिक भेद हैं। जो भी हो, मूर्त रूप में सन्‌ 1901 की जनगणना के अनुसार, जो जातिगणना की दृष्टि से अधिक शुद्ध मानी जाती है, भारत में उनकी संख्या 2378 है। यह गाड़ना मात्र एक वर्ण यानी की ब्राह्मण के बारे में है, अगर सभी वर्णों के बारे में चर्चा की जाय और सभी जातिओं के बारे में इनका डाटा एकत्रित किया जाय तो आप सोचिये यह गड़ना कहा पहुचेगी ।
वर्ण और जाति  के बारे में अध्यन से पता चलता है कि आदिकाल में भी जातिओं का प्रचलन था, लेकिन उस समय की जातियां अन्य नामों से जानी जाती थी ।  वेद और महाभारत काल के अनुशार मुख्य रूप से  देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि जातियां थी । देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई थी । दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई थी । इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है।
प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इस जुड़ी हुई धरती को प्राचीन काल में 7 द्वीपों में बांटा गया था- जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। इसमें जम्बू द्वीप में मानव का उत्थान और विकास हुआ। एक ही कुल और जाति का होने के बाद मानव भिन्न भिन्न जगहर पर रहकर हजारों जातियों में बंटता गया। पहले स्थानीय आधार पर जाति को संबोधित किया जाता था, जो आज भी काफी हद तक प्रचालन में है  जैसे कि पुरोहित, राजपूत, लोहार, तेली, कुर्मी. धोबी आदि कुछ उत्तरभारतीय हिन्दू जातियाँ हैं।
वर्ण और जाति  में से जाति की परिभाषा असंभव मानते हुए अनेक विद्वानों ने उसकी विशेषताओं का उल्लेख करना उत्तम समझा है। डॉ॰ जी. एस धुरिए के अनुसार जाति की दृष्टि से हिंदू समाज की छह विशेताएँ हैं –
(1) जातीय समूहों द्वारा समाज का खंडों में विभाजन,
(2) जातीय समूहों के बीच ऊँच नीच का प्राय: निश्चित तारतम्य,
(3) खानपान और सामाजिक व्यवहार संबंधी प्रतिबंध
(4) नागरिक जीवन तथा धर्म के विषय में विभिन्न समूहों की अनर्हताएँ तथा विशेषाधिकार,
(5) पेशे के चुनाव में पूर्ण स्वतंत्रता का अभाव और
(6) विवाह अपनी जाति के अंदर करने का नियम।
भारत में जाति चिरकालीन सामाजिक संस्था है। ई. ए. एच. ब्लंट के अनुसार जातिव्यवस्था इतनी परिवर्तनशील है इसका कोई भी स्वरूपवर्णन अधिक दिनों तक सही नहीं रहता। इसका विकास अब भी जारी है। नई जातियों तथा उपजातियों का प्रादुर्भाव होता रहता है और पुरानी रूढ़ियों का क्षय हो जाता है। नए मानव समूहों को ग्रहण करने की इसमें विलक्षण क्षमता रही है। कभी कभी किसी क्षेत्र की कोई संपूर्ण जाति या उसका एक अंग धार्मिक संस्कारों तथा सामाजिक रीतियों में ऊँची जातियों की नकल करके और शिक्षा तथा संपत्ति, सत्ता और जीविका आदि की दृष्टि से उन्नत होकर कालक्रम में अपनी मर्यादा को ऊँचा कर लेती है। इतिहास में अनेक ऐसे भी उदाहरण हैं जब छोटी या शूद्र जातियों के समूहों को राज्य की कृपा से ब्राह्मण तथा क्षत्रिय स्वीकार कर लिया गया। जे. विलसन और एच. एल. रोज के अनुसार राजपूताना, सिंघ और गुजरात के पोखराना या पुष्करण ब्राह्मण और उत्तर प्रदेश में उन्नाव जिले के आमताड़ा के पाठक और महावर राजपूत इसी प्रक्रिया से उच्च जातीय हो गए।
भारत में वर्ण और जाति

अन्य धर्मों में जाति ब्यवस्था

भारत में जाति सर्वव्यापी तत्व है। ईसाइयों, मुसलमानों, जैनों और सिखों में भी जातियाँ हैं और उनमें भी उच्च, निम्न तथा शुद्ध अशुद्ध जातियों का भेद विद्यमान है, फिर भी उनमें जाति का वैसा कठोर रूप और सूक्ष्म भेद प्रभेद नहीं है जैसा हिंदुओं में है। ईसा की 12 वीं शती में दक्षिण में वीर शैव संप्रदाय का उदय जाति के विरोध में हुआ था। किंतु कालक्रम में उसके अनुयायिओं की एक पृथक्‌ जाति बन गई जिसके अंदर स्वयं अनेक जातिभेद हैं। सिखों में भी जातीय समूह बने हुए हैं और यही दशा कबीरपंथियों की है। गुजरात की मुसलिम बोहरा जाति की मस्जिदों में यदि अन्य मुसलमान नमाज पढ़े तो वे स्थान को धोकर शुद्ध करते हैं। बिहार राज्य में सरकार ने 27 मुसलमान जातियों को पिछड़े वर्गो की सूची में रखा है। केरल के विभिन्न प्रकार के ईसाई वास्तव में जातीय समूह हो गए हैं। मुसलमानों और सिक्खों की भाँति यहाँ के ईसाइयों में अछूत समूह भी हैं जिनके गिरजाघर अलग हैं अथवा जिनके लिये सामान्य गिरजाघरों में पृथक्‌ स्थान निश्चित कर दिया गया है। किंतु मुसलमानों और सिखों के जातिभेद हिंदुओं के जातिभेद से अधिक मिलते जुलते हैं जिसका कारण यह हे कि हिंदू धर्मं के अनुयायी जब जब इस्लाम या सिख धर्म स्वीकार करते हें तो वहाँ भी अपने जातीय समूहों को बहुत कुछ सुरक्षित रखते हैं और इस प्रकार सिखों या मुसलमानों की एक पृथक्‌ जाति बन जाती है।
वर्ण और जाति के भेद को आज के परिदृश्य में प्रस्तुत करने की हमने एक छोटी सी कोशिश की है, आशा है उपर्युक्त विवेचना से पाठको को इसे समझने में कुछ मदद जरूर मिलेगी ।

बुधवार, 30 मार्च 2016

आचार्य सुश्रुत (Acharya Sushruta)


शल्य चिकित्सा (सर्जरी) के पितामह और सुश्रुतसंहिता के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व काशी में हुआ था। सुश्रुत का जन्म विश्वामित्र के वंश में हुआ था। इन्होंने धन्वन्तरि से शिक्षा प्राप्त की थी।
सुश्रुतसंहिता को भारतीय चिकित्सा पद्धति में विशेष स्थान प्राप्त है। इसमें शल्य चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है। शल्य क्रिया के लिए सुश्रुत 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे। ये उपकरण शल्य क्रिया की जटिलता को देखते हुए खोजे गए थे। इन उपकरणों में विशेष प्रकार के चाकू, सुइयां, चिमटियां आदि हैं। सुश्रुत ने 300 प्रकार की ऑपरेशन प्रक्रियाओं की खोज की। आठवीं शताब्दी में सुश्रुतसंहिता का अरबी अनुवाद किताब-इ-सुश्रुत के रूप में हुआ। सुश्रुत ने कॉस्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता हासिल कर ली थी।
एक बार आधी रात के समय सुश्रुत को दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। उन्होंने दीपक हाथ में लिया और दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते ही उनकी नजर एक व्यक्ति पर पड़ी। उस व्यक्ति की आंखों से अश्रु-धारा बह रही थी और नाक कटी हुई थी। उसकी नाक से तीव्र रक्त-स्राव हो रहा था। व्यक्ति ने आचार्य सुश्रुत से सहायता के लिए विनती की। सुश्रुत ने उसे अन्दर आने के लिए कहा। उन्होंने उसे शांत रहने को कहा और दिलासा दिया कि सब ठीक हो जायेगा। वे अजनबी व्यक्ति को एक साफ और स्वच्छ कमरे में ले गए। कमरे की दीवार पर शल्य क्रिया के लिए आवश्यक उपकरण टंगे थे। उन्होंने अजनबी के चेहरे को औषधीय रस से धोया और उसे एक आसन पर बैठाया। उसको एक गिलास में शोमरस भरकर सेवन करने को कहा और स्वयं शल्य क्रिया की तैयारी में लग गए। उन्होंने एक पत्ते द्वारा जख्मी व्यक्ति की नाक का नाप लिया और दीवार से एक चाकू व चिमटी उतारी। चाकू और चिमटी की मदद से व्यक्ति के गाल से एक मांस का टुकड़ा काटकर उसे उसकी नाक पर प्रत्यारोपित कर दिया। इस क्रिया में व्यक्ति को हुए दर्द का शौमरस ने महसूस नहीं होने दिया। इसके बाद उन्होंने नाक पर टांके लगाकर औषधियों का लेप कर दिया। व्यक्ति को नियमित रूप से औषाधियां लेने का निर्देश देकर सुश्रुत ने उसे घर जाने के लिए कहा।
सुश्रुत नेत्र शल्य चिकित्सा भी करते थे। सुश्रुतसंहिता में मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया है। उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था। सुश्रुत को टूटी हुई हड्डी का पता लगाने और उनको जोड़ने में विशेषज्ञता प्राप्त थी। शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्यपान या विशेष औषधियां देते थे। सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे।
उन्होंने अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा के सिद्धांत बताये और शल्य क्रिया का अभ्यास कराया। प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया के अभ्यास के लिए फलों, सब्जियों और मोम के पुतलों का उपयोग करते थे। मानव शरीर की अंदरूनी रचना को समझाने के लिए सुश्रुत शव के ऊपर शल्य क्रिया करके अपने शिष्यों को समझाते थे। सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में अद्भुत कौशल अर्जित किया तथा इसका ज्ञान अन्य लोगों को कराया। उन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों जैसे शरीर संरचना, काया-चिकित्सा, बाल रोग, स्त्री रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी। कई लोग प्लास्टिक सर्जरी को अपेक्षाकृत एक नई विधा के रूप में मानते हैं। प्लास्टिक सर्जरी की उत्पत्ति की जड़ें भारत की सिंधु नदी सभ्यता से 4000 से अधिक साल से जुड़ी हैं। इस सभ्यता से जुड़े श्लोकों को 3000 और 1000 ई.पू. के बीच संस्कृत भाषा में वेदों के रूप में संकलित किया गया है, जो हिन्दू धर्म की सबसे पुरानी पवित्र पुस्तकों में में से हैं। इस युग को भारतीय इतिहास में वैदिक काल के रूप में जाना जाता है, जिस अवधि के दौरान चारों वेदों अर्थात् ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद को संकलित किया गया। चारों वेद श्लोक, छंद, मंत्र के रूप में संस्कृत भाषा में संकलित किए गए हैं और सुश्रुत संहिता को अथर्ववेद का एक हिस्सा माना जाता है।
सुश्रुत संहिता, जो भारतीय चिकित्सा में सर्जरी की प्राचीन परंपरा का वर्णन करता है, उसे भारतीय चिकित्सा साहित्य के सबसे शानदार रत्नों में से एक के रूप में माना जाता है। इस ग्रंथ में महान प्राचीन सर्जन सुश्रुत की शिक्षाओं और अभ्यास का विस्तृत विवरण है, जो आज भी महत्वपूर्ण व प्रासंगिक शल्य चिकित्सा ज्ञान है। प्लास्टिक सर्जरी का मतलब है- शरीर के किसी हिस्से की रचना ठीक करना। प्लास्टिक सर्जरी में प्लास्टिक का उपयोग नहीं होता है। सर्जरी के पहले जुड़ा प्लास्टिक ग्रीक शब्द प्लास्टिको से आया है। ग्रीक में प्लास्टिको का अर्थ होता है बनाना, रोपना या तैयार करना। प्लास्टिक सर्जरी में सर्जन शरीर के किसी हिस्से के उत्तकों को लेकर दूसरे हिस्से में जोड़ता है। भारत में सुश्रुत को पहला सर्जन माना जाता है। आज से करीब 2500 साल पहले युद्ध या प्राकृतिक विपदाओं में जिनकी नाक खराब हो जाती थी, आचार्य सुश्रुत उन्हें ठीक करने का काम करते थे।

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

Hanuman signs found Worldwide

La Ciudad Blanca [Spanish for ‘The White City‘) is a legendary settlement said to be located in the Mosquitia region of eastern Honduras (in Central America).Charles Lindberg, during one of his flights over the jungles of Mosquitia in Hondurus, claimed caught a glimpse of what he thought was the ‘Lost City of the Monkey God‘ where, legend says that local people worshipped huge ‘Monkey Sculptures‘.Theodore Morde – an American adventurer, worked on the tip given by Lindberg and claimed that he had finally found the lost city in 1940.He claimed sacrifices were made by local Indians to a gigantic idol of an ape. However, he was killed by a car in London before he could announce its exact location.

Ramayana’s Kishkinda Kanda descibes about Trident of Peru, South America etc and Yuddha Kanda(War Episode) describes about Hanuman travelling to Paatala Loka (Central America and Brazil, which are on other side of India in globe) and meeting his son Makaradhwaja, who resembles him.After killing the King of Paatala, Hanuman makes his son Makaradhwaja as ruler of that kingdom and he is being worshipped as God since then.This could be one of the reasons why ancient americans of central and south paint red color to all their gods statues.The discovery of Vedic Havan Kund in peru is also one more evidence of Vedic influence in this region.

Morde speculated that the deity statue of a “Monkey God" was an American parallel to the Hindu deity Hanuman, who he says was the equivalent of America’s own Paul Bunyan in his amazing feats of strength and daring.Morde was told that the temple had a “long, staired approach” lined with stone effigies of monkeys. “The heart of the Temple was a high stone dais on which was the statue of the Monkey God himself. Before it was a place of sacrifice.Morde and Brown brought back thousands of artifacts, most of which became part of the collection of the Heye Foundation Museum of the American Indian in New York City.These included metal razors, stone blades, a flute, stone statuary, and stone utensils. Morde and Brown also reported having found evidence of gold, silver, platinum, and oil and are now at display in National Museum of the American Indian in Washington, D.C.Later, journalists and authors have associated Morde’s “City of the Monkey God” with La Ciudad Blanca.

Ancient Indian Robotics


An ancient book called Yoga Vasistha describes War Machines or Robots prepared by Sambarasura(well known to have mystic powers and could raise himself in the sky and fight from outer space)

They were three in number and were named as Dama, Vyala and Kata. Kata was like a modern tank protecting army. The word ‘Kat’ means to go, to cover. It could go and cover the army so the name. The name ‘Dama’ is derived from the root Dam which means to tame, subdue, conquer, restrain of course the enemy. ‘Vyala’ means vicious, fierce, cruel, savage like tiger or snake. Those three Robots were lifeless machines and therefore had no sentiments, no emotions, so they were never defeated.

They always won the wars against Adityas (gods). So Adityas played a trick to induce sentiments and emotions in them. They fought with the three Robots and ran away, many times,with defeat. This induced Ego in the Robots.Ego arises as the robots were thinking due to artificial intelligence.At the same time Adityas talked to them and told that because of their valor Sambarasura wins and enjoys his life at their cost.This added emotions and sentiments. They felt that they should also enjoy their lives.As the human sentiments arose, fear too propped up in them. Naturally they could not fight with the previous zeal and ere defeated by Adityas.

Modern day robots have Artificial intelligence embedded into them. So one day they might get Ego and then they may rebel against the mankind. It will be difficult to defeat them.They may conquer the mankind. In that situation man can play the same trick as played by the Gods. For future this past story is very useful. We may learn from the past history if we study the history with proper bearing.